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#बाहों_भर_आकाश
आज उम्र को जेसे ठेंगा दिखाया है
चेहरे पर अजब सा निखार है
हतप्रभ हूँ खुद को ही आईने मैं देखकर ..
शायद तुम्हारे इश्क़ की खुमारी है.. 
शायद क्यों सच ही तो है ...
जब से मिली हूँ तुमसे .. बदल सी गयी हूँ में..
खुद से ही बातें करते_करते मुस्कुरा उठती हूँ ,
और कभी बच्चों की तरह फूट-फूट कर रो पड़ती हूँ
न जाने क्या जादू किया है तुमने मुझ पर ..सच, बदल गयी हूँ में..
रात जिस पहर झील मैं चाँद उतरता है ,
उसका अमृत निचोड़कर नहाती हूँ मैं ..
खिल उठता है मेरा यौवन,
रोक नहीं पाते हो खुद को,
मुझे अपनी बाहों मैं भर लेते हो तुम ...
और नज़रों से मुझे घूँट _घूँट पीते हो ...
सौंधी-सौंधी सी महक उठती है ..
हमारे जिस्मों की महक से बैचैन होकर ,
यहाँ _वहां टहलने लगती है हवा ...
कलियाँ शर्माकर चटक जाती हैं ,
फूल शाख से झरने लगते हैं ...
तुम्हारा प्यार ओस जैसे बरसता है ,
उस वक़्त कायनात मानो थम सी जाती है ,
जब रोपते हो प्रेम बीज तुम धरा की कोख मैं ...
शब्द खामोशी ओढ़ लेते हैं तब ,
एक तृप्त एहसास से भर उठती हूँ मैं ..
हाँ मेरा आकाश हो तुम ,
तुम्हें बाहों मैं भर लेती हूँ मैं ...
------राधा श्रोत्रिय "आशा "

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